ईद-उल-फितर के इतिहास और महत्व

ईद-उल-फितर के इतिहास और महत्व

ईद मनाने की तारीख चांद दिखने के हिसाब से ही तय की जाती है। लेकिन ईद मनाने के साथ ही इसके इतिहास से भी रूबरू होना जरूरी है। जो इस पर्व की महत्वता को बढ़ाता है।

ईद-उल-फितर मुस्लिम समुदाय के लिए बहुत ही पावन पर्व है। जिसे मीठी ईद भी कहा जाता है। ईद किस दिन मनाई जाएगी ये पूरी तरह चांद नजर आने पर निर्भर करता है। तो आइए जानते हैं इस दिन से जुड़ी कुछ खास बातें।

कैसे और कब हुई थी ईद मनाने की शुरुआत:-

ईद की शुरूआत मदीना नगर से हुई थी, जब पैगंबर मोहम्मद मक्का से मदीना आए थे। मोहम्मद साहब ने कुरान में दो पवित्र दिनों को ईद के लिए निर्धारित किया था। इसी वजह से साल में दो बार ईद मनाने की परंपरा है। एक है ईद-उल-फितर (मीठी ईद) और दूसरा है ईद-उल-अज़हा (बकरीद)।
इस्लामिक मान्यता के अनुसार ईद उल फितर की शुरूआत जंग-ए-बद्र के बाद हुई थी। जिसमें पैगंबर मुहम्मद साहब की अगुवाई में मुसलमानों को जीत हासिल हुई थी। जीत की खुशी में लोगों ने ईद मनाई थी। ईद उल-फितर का त्योहार अमीर से लेकर गरीब हर कोई खुशी से मना सके इसके लिए इस्लाम में ग़रीबों को फितरा भी दिया जाता है। होली की ही तरह ईद के दिन भी लोग एक दूसरे से गले मिलकर आपसी प्यार को बढ़ाते हैं ।

ईद का महत्व

ईद-उल-फितर के दिन लोग खुदा का शुक्रिया अदा करते हैं। सुबह लोग नमाज अदायगी करते हैं और फिर शुरू होता है ईद का त्योहार। लोग नए-नए कपड़े पहनते हैं, एक दूसरे से गले मिलते हैं, बधाईयों के साथ उपहारों का भी आदान-प्रदान होता है। घरों में तरह-तरह के पकवान बनाए जाते हैं खासतौर से मीठी सेवईंयां। जो ईद-उल-फितर की ट्रेडिशनल डिश है। हर घर में आपको इसका स्वाद चखने को मिल जाएगा। इस दिन एक और खास ट्रेडिशन जो लोग फॉलो करते हैं वो है जकात यानी दान। जिसमें अपनी कमाई का एक हिस्सा दान किया जाता है। अपनी क्षमता के हिसाब से लोग दान करते हैं जिससे इस त्यौहार की महत्वता और बढ़ जाती है।